
जम्मू कश्मीर और हरियाणा के विधानसभा चुनावों का अलग-अलग कारणों से विशेष महत्व था। जहां जम्मू-कश्मीर को लेकर यह उत्सुकता थी कि हमारा यह भूभाग लोकतंत्र की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं! वहीं, हरियाणा इस कारण सबकी निगाह में था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की लोकप्रियता का जो ग्राफ गिरा, उसमें कोई बदलाव आता है या नहीं? जम्मू-कश्मीर की जनता ने विधानसभा चुनाव के नतीजों के पहले ही यह जरूरी संदेश दिया था कि यहां लोकतंत्र ने फिर से अपनी जड़ें जमा ली हैं। देश के साथ दुनिया को यह संदेश मिल जाने के चलते बस यह जिज्ञासा रह गई थी कि सत्ता किसे हासिल होती है?
चूंकि भाजपा यहां सभी सीटों पर चुनावनहीं लड़ी और जम्मू संभाग की तुलना में कश्मीर घाटी में उसका प्रभाव नगण्य ही थी, इसलिए इसके आसार न्यून ही थे कि वह सत्ता की प्रबल दावेदार बन जाएगी। इसके बाद भी यह उल्लेखनीय है कि जम्मू संभाग में विरोधियों पर भारी पड़ने के साथ ही उसने कश्मीर घाटी में अपने जनाधार की जमीन तैयार की।
चुनावी विश्लेषण
1966 में हरियाणा गठन के बाद से यह पहला मौका है जब किसी दल ने सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी की है। वहीं, यह भाजपा की हरियाणा में अब तक की सबसे बड़ी जीत भी है। भाजपा ने 2014 में हरियाणा में 47 तो 2019 में 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार पार्टी को 48 सीटों पर विजय मिली है। वहीं जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन ने बड़ी जीत दर्ज की है।
राज्य की 49 सीटें गठबंधन के खाते में गई हैं। हालांकि सत्ता की इस दौड़ में पीछे रहने के बाद भी भाजपा ने 2014 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। उसने 29 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि 2014 में उसके पास 25 सीटें ही थीं। सबसे बड़ा झटका पीडीपी को लगा है, जो सिर्फ तीन सीटें ही जीत पाई जबकि 2014 में उसे 28 सीटों पर जीत मिली थी।
हरियाणा का चुनावी गणित
* कांग्रेस की जाट वोटों पर अतिनिर्भरता और गैर-जाट वोटों का भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण।
* कांग्रेस में गुटबाजी, कुमारी सैलजा और सुरजेवाला की नाराजगी।
* जीत को लेकर कांग्रेस नेताओं का अतिआत्मविश्वास।
* छह माह पहले भाजपा का मुख्यमंत्री को बदलना व नए चेहरों पर दांव।
* उम्मीदवारों के चयन, चुनाव प्रचार व मतदान केंद्रों पर आरएसएस और भाजपा के बीच बेहतर समन्वय।
हरियाणा में क्यों हारी कांग्रेस
हरियाणा विधानसभा चुनाव में आम धारणा यही थी कि कांग्रेस सत्ता में आ रही है, लेकिन नतीजे बिल्कुल उलट रहे। यदि हरियाणा में कांग्रेस लगातार तीसरी बार भाजपा से पीछे रह गई तो इसके लिए वही अधिक जिम्मेदार है। कांग्रेस ने 2014 से ही संगठन, सोच, नेतृत्व और व्यवहार के स्तर पर ऐसा परिवर्तन नहीं किया कि उसके प्रदर्शन में चमत्कारिक बदलाव हो। बावजूद इसके लोकसभा चुनाव में उसने भाजपा की आंतरिक कमजोरी, आरक्षण एवं संविधान खत्म किए जाने के निराधार भय के साथ जातीय विभाजन की बातों से दस में से पांच सीटें हासिल कीं। इससे कांग्रेस को लगा कि थोड़ा परिश्रम करें तो भाजपा को हरा सकते हैं।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर अतिविश्वास
भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे अनुभवी नेता एवं प्रभावशाली-बलशाली जाति के चेहरे की संपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने से भी कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा था। हुड्डा की स्थिति इतनी प्रभावी थी कि केंद्रीय नेतृत्व आम आदमी पार्टी से गठबंधन चाहता था, लेकिन उनके दबाव से पीछे हटा। यह निर्णय स्थानीय स्थिति के मद्देनजर गलत नहीं था, किंतु भाजपा के विरुद्ध आइएनडीआइए की एकजुटता का दावा अवश्य कमजोर पड़ा।
विधानसभा चुनाव में बदला दलितों का मन
जहां राहुल गांधी हरियाणा में दलितों की अस्मिता को लेकर सवाल उठाते रहे, वहीं कुमारी सैलजा की भूमिका दलितों के लिए सम्मान का विषय बन गई। उनकी जाति के नाम पर गाली देते हुए वायरल वीडियो के विरुद्ध विपरीत प्रतिक्रिया हुई। हरियाणा में दलितों के सम्मेलन में भाजपा के समर्थन का एलान हुआ। जींद में अति पिछड़ों की रैली में भी ऐसी ही घोषणा हुई। यह सब इसका सूचक था कि लोकसभा चुनाव के समय से स्थितियां बदली हैं। दलितों के बहुमत ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट दिया था लेकिन विधानसभा में उनका मन बदला और इसी कारण परिणाम भाजपा के पक्ष में आया।
अग्निवीर-किसान आंदोलन जैसे मुद्दे निष्प्रभावी
यह भी स्पष्ट है कि जाट नेताओं ने सत्ता के लिए जैसा व्यवहार किया, उससे दूसरी जातियां थोड़ा सतर्क हुईं। अग्निवीरों का समायोजन करने की घोषणा कर भाजपा ने दुष्प्रचार की काट की। वैसे भी यह जमीन पर वैसा मुद्दा नहीं था, जैसा बाहर दिखाया जा रहा था। यही स्थिति किसानों के संदर्भ में थी। किसानों के नाम पर आंदोलन करने वाले नेताओं ने अपने प्रभाव वाले अंबाला में अनिल विज को हराने के लिए पुरजोर अभियान चलाया लेकिन वह जीत गए।
जम्मू-कश्मीर का चुनावी गणित
* अनुच्छेद 370 और अन्य भावनात्मक मुद्दों पर कश्मीर की भावनाओं को उठाकर नेकां मजबूत हो गई।
* पीडीपी का कमजोर होना भी नेकां के फायदे में रहा।
* प्रतिबंधित जमात समर्थक उम्मीदवारों का नुकसान पीडीपी को झेलना पड़ा।
* लोकसभा सदस्य इंजीनियर रशीद बड़ा फैक्टर नहीं बन पाए।
* पहाड़ी और गुज्जर वोट को साधने में भाजपा विफल रही और राजौरी-पुंछ की आठ सीटों में से एक सीट जीती।
जम्मू-कश्मीर में भाजपा का सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत
जम्मू-कश्मीर का विधानसभा चुनाव भी कम रोचक नहीं था। वोट प्रतिशत के लिहाज से भाजपा जहां राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है। उसे सबसे अधिक 25.60 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि सीटों के लिहाज से नेशनल कांफ्रेंस को सबसे अधिक 42 सीटें मिली हैं। उसका वोट प्रतिशत भाजपा के पीछे 23.47 प्रतिशत ही है। कांग्रेस को राज्य में करीब 12 प्रतिशत व पीडीपी को करीब नौ प्रतिशत ही वोट मिले।
जम्मू के मैदानों पर खूब खिला कमल
जम्मू-कश्मीर में 10 वर्ष बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू संभाग के मैदानी इलाकों में अपने झंडे गाड़ दिए हैं। भाजपा ने जम्मू, कठुआ, सांबा व ऊधमपुर जिले की 24 में से 22 सीटें अपने नाम कीं। उक्त जिलों में नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन खाता भी नहीं खोल पाई। इसके अलावा भाजपा ने पहाड़ी क्षेत्रों में सात सीट कब्जाई। कांग्रेस को जम्मू संभाग के राजौरी से एक सीट मिली, बाकी पांच कश्मीर से जीतीं। जबकि दो सीट निर्दलीय उम्मीदवार सतीश शर्मा ने जम्मू के छंब व डा. रामेश्वर ने कठुआ के बनी से जीती। दोनों नेता कांग्रेस और भाजपा को छोड़ निर्दलीय चुनावी मैदान में थे।
जम्मू-कश्मीर में छह सीटो पर क्यों सिमटी कांग्रेस
* पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का कमजोर होना।
* वरिष्ठ नेताओं का पार्टी के लिए नहीं, बल्कि अपने विधानसभा क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना।
* जमीनी सतह पर कार्यकर्ताओं की संख्या कम होना।
* बूथ पर पार्टी का मजबूत न होना।
* भाजपा के आक्रामक रुख का जवाब देने में ढुलमुल रवैया।
* अहम मुद्दों को लेकर लोगों तक पहुंच बनाने में विफल रहना।
जनादेश से निकले दो विशेष संदेश
जम्मू-कश्मीर और हरियाणा चुनावों के संदेश भिन्न हैं। जहां जम्मू-कश्मीर चुनावों ने विश्व को यह संदेश दिया कि भारत के इस भूभाग में लोकतंत्र सशक्त और जीवंत है, वहीं हरियाणा का जनादेश भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के तथाकथित ह्रास एवं डबल इंजन के फेल होने के नैरेटिव को खारिज करता है। ये दोनों ही संदेश बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। भाजपा जानती थी कि जम्मू-कश्मीर में केवल 60 सीटों पर चुनाव लड़कर बहुमत पाना और सरकार बनाना संभव नहीं।
उसे तो यह साबित करना था कि उसने जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की जड़ें गहरी करने का काम किया है। वह इसमें सफल रही। हरियाणा की अभूतपूर्व विजय से भाजपा को महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली और बिहार के आगामी चुनावों में वांछित ऊर्जा और आत्मविश्वास अवश्य मिलेगा।


