जम्मू कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव

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जम्मू कश्मीर में दस साल बाद होने जा रहे विधान सभा चुनाव बेहद बदली हुई परिस्थितियों में होंगे। धारा 370 हटाये जाने, पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म होने और लद्दाख के अलग केंद्र शाषित प्रदेश बनने के पाँच साल बाद होने जा रहे इस चुनाव में पहले से न सिर्फ ज्यादा सीटें होंगी बल्कि विधान सभा में कश्मीरी पंडितों और पीओके से विस्थापितों का प्रतिनिधित्व होगा।

पहली बार एससी-एसटी सीटों की सुरक्षित व्यवस्था होगी। अहम यह है कि चुनाव के बाद सरकार से अधिक शक्तियां उपराज्यपाल के पास होंगी। पुलिस, भूमि और सार्वजनिक आदेश की अहम ज़िम्मेदारी उपराज्यपाल के पास होंगी। दिल्ली की तर्ज पर सरकार के पास शिक्षा, चिकित्सा, बिजली, पानी, सड़क, परिवहन जैसे विभाग ही होंगे।

जम्मू संभाग की ताकत बढ़ी

परिसीमन के बाद विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ गई। पहले लद्दाख समेत 87 सीटों पर चुनाव होते थे इस बार संख्या 90 है। परिसीमन के बाद जम्मू की सीटें 37 से बढ़कर 43, तो कश्मीर की सीटें 46 से बढ़कर 47 हो गई हैं। यानि सरकार बनाने के लिए कश्मीर के साथ जम्मू में भी दमखम बढ़ाना होगा।

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पहली बार विधानसभा चुनाव में एससी-एसटी आरक्षण लागू हुआ है। इसके तहत एससी सुरक्षित सात व एसटी की सुरक्षित नौ सीटें हैं। कश्मीरी पंडितों के लिए दो और पीओके विस्थापित के लिए एक सीट है। इनका मनोनयन उपराज्यपाल करेंगे। विधानसभा की कुल 93 सीटें होंगी। कश्मीरी पंडितों की एक सीट महिलाओं के लिए सुरक्षित है।

चुनाव में धारा 370 और पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म होना अहम मुद्दा होगा। पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस इसे मुद्दा बनाए हुए हैं।  भाजपा की नगाहें जम्मू संभाग में बेहतर  प्रदर्शन कर सत्ता की चाभी अपने हाथ में रखने की है।

गौरतलब है कि बीते चुनाव में पार्टी ने जम्मू संभाग की 37 में से 25 सीटें जीती थीं। बाद में पार्टी ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई थी। हालांकि मतभेद के कारण 2018 में पार्टी ने महबूबा मुफ़्ती सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

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